Friday, 18th August, 2017

यूपी चुनाव के बाद पार्टीयों का विश्लेषण

14, Mar 2017 By khakshar

चुनाव खत्म हो जाने और नतीज़े निकल जाने के बाद नेता गण अपने सामान्य कार्य में लग जाते हैं। इधर का उधर करना, दुसरे नेता का मंत्री -पद काटना, स्टुडियो में रणनीति करना आदि। कुछ छुट्टी मनाने विदेश चले जाते हैं, कुछ सरकारी खर्चे पर विश्व-भ्रमण पे तो कुछ उपासना-विपासना करने लग जाते हैं। यूपी के चुनाव ने कुछ नया रास्ता खोल दिया हैं। ये नतीजों में ही दिखता हैं बल्कि नेता जी के आराम में भी दिखने लगा हैं।

सूत्र ज्यादातर पार्टी ऑफिस के पिछवाड़े ही मिलते हैं। ऐसे ही एक सूत्र ने बताया कि भाजप के नेताओं में से कोई दाँत पर स्पेशल व्हाइटनिंग पेस्ट घिस रहा हैं, तो कोई गँजे सर पर उस्तरा चलवा रहा हैं। क्या पता दिल्ली के नेताओ को कौन सी स्वच्छता पसंद आ जाए।

काँग्रेस ऑफिस के सामने खडा कबाड़
काँग्रेस ऑफिस के सामने खडा कबाड़

समाजवादी कार्यालय के पीछे में घुमते हुए ये बात-चीत सुनाई दी। “अब भुगतो, पहले ही कहा था, साइकिल को विकअम (विक्रम) मत बनाओ। एक विकअम (विक्रम) और सौ वैताल। मैनपुई (मैनपुरी) की जितने यादव हैं, सब टिकट माँगते हैं। वैताल बैठ जाते हैं फिर लात भी माअते (मारते) हैं विकअम (विक्रम) को। अब बताओ दोनों गीयेंगे (गिरेंगे) या नई।”

दूसरी आवाज आई, “हवे (हमें) तो पहले से ही शक़ था। साइकिल पे एक औ सवाई (सवारी) चढ़ा लिया। वो सवाई (सवारी) भी ऐसा जिसे अपनी पार्टी के लोग भी नहीं बुआते (बुलाते) हैं। तुमसे ना हो पायेगा..

बहुजन समाज पार्टी के आस-पास डॉक्टरो की एक टीम बहस कर रही थी। सीनियर डॉक्टर आला लगा कर समझा रहे थे। पहले भी बताया था कि तीन दौरे के बाद आदमी बचे ना बचे, औरते बच जाती हैं। हाँ, थोड़ा ज्यादा सटक जरूर जाती है। बहुत तगड़ा दिल होता हैं बहनों का। पहले लोक सभा का चुनाव में शुन्य सीट, नोटबंदी और फिर ये चुनाव का झटका।

काँग्रेस पार्टी के लखनऊ कार्यालय की रंगाई-पुताई वर्षों से नहीं हुई हैं। ऐसा मानना हैं कि जो इसे रंगवाता हैं उसका राजनीतिक ग्राफ नीचे चला जाता हैं। सताइस साल पुराना ताला लटका था वहाँ और अस्सी साल का चौकीदार गुनगुना रहा था-

तेरे दीदार से अगर होता अपनों  का भला; मक्खी क्यूँ मारता ये खाकसार दिलजला