Friday, 29th July, 2016

नवजोत सिद्धू और दिग्विजय सिंह के बीच चुनावी बहस

12, Nov 2012 By Sandeep Kadian

अमरीका मे राष्ट्रपति चुनाव से पहले रौमनी और ओबामा के बीच हुई बहस से प्रेरित हो कर भारतीय राजनीतिक दलों ने भी गुजरात चुनाव से पहले राष्ट्रीय टीवी चैनल पर एक बहस आयोजित करने का निर्णय लिया. इस बहस के लिए जहाँ कॉंग्रेस ने दिग्विजय सिंह को मनोनीत किया वहीं भाजपा ने BIGG BOSS से सिद्धू को इसके लिए बाहर बुलवाया. इस बहस का संचालन करने के लिए इस FN पत्रकार को निमंत्रित किया गया . पेश है इस बहस के कुछ अंश.

Digvijay Singh and Navjot Singh Sidhu
बहस के दौरान दिग्विजय सिंह और नवजोत सिद्धू

FN पत्रकार: स्वागत है आप सब का इस अनोखी बहस मे, भारत के इतिहास मे पहली बार चुनावी बहस. मैं स्वागत करता हूँ दिग्विजय जी और सिद्धू जी का जो यहाँ चुनावी मुद्धों पर चर्चा करेंगे. दिग्विजय जी आप से शुरू करते हैं.

दिग्विजय: जी सबसे बड़ा मुद्धा तो ये है की मोदी जी शादी-शुदा हैं, इसलिए उन्हे अगला मुख्यमंत्री कतई नहीं बनना चाहिए. क्या सिद्धू जी इस बात का जवाब देंगे की मोदी जी शादी-शुदा हैं या नहीं?

सिद्धू: दिग्विजय जी हर सवाल का जवाब नहीं होता, हर हुस्न का शबाब नहीं होता. भंवरे तो हर फूल पर खिलते हैं पर हर फूल गुलाब नहीं होता.

दिग्विजय: अरे लेकिन इस बात का मेरी बात से क्या लेना देना है?

सिद्धू: तो तुम्हारी बात का चुनाव से क्या लेना देना है? ठोको ताली!

FN पत्रकार: वापिस मुद्धे पर आते हैं. तो गुजरात के विकास के बारे मे आपका क्या कहना है दिग्विजय जी?

दिग्विजय: विकास तो हो ही रहा है. मोदी जी पुरुष पैदा हुए थे लेकिन जैसा मणिशंकर जी ने कहा वे लहू पुरुष मे विकसित हो गये हैं.

सिद्धू: दिग्विजय जी माना की तेरे प्यार के काबिल नहीं हम. उस जनता से जाके पूछ जिसे हासिल नही हम. मत डर देख के किसी के हाथों पे लहू. नाम लिखा हे तेरा कातिल नहीं हैं हम.

दिग्विजय: आप फिर मुद्धे से भटका रहे हैं!

सिद्धू: गुरु भटकना काम है मेरा, भटकाना नहीं है. वो जो पीछे है बाथरूम, मर्दों का है, जनाना नहीं है.

दिग्विजय: इसे कहाँ से ले कर आए यार?

FN पत्रकार: जी BIGG BOSS.. चलिए वो जाने दीजिए, चुनाव के बारे मे बात करते हैं. अगर कॉंग्रेस जीत गयी तो आप लोगों को क्या देंगे?

दिग्विजय: अरे पगले, चुनाव कुछ देने के लिए थोड़ी जीते जाते हैं. वो तो लेने के लिए जीते जाते हैं.

सिद्धू: तू क्या ले कर आया था, तू क्या ले जाएगा. खाली हाथ आया था और खाली हाथ जाएगा!

दिग्विजय: सिद्धू जी आप सीधे शब्दों मे बात नहीं कर सकते. आपकी कोई बात ही नहीं समझ आती.

सिद्धू: समझ समझ के समझ को समझो..समझ समझना भी एक समझ है..समझ समझके जो ना समझे ..मेरी समझ मे वो ना समझ है!

दिग्विजय: आपके सामने तो कोई लड़की भेजनी चाहिए थी, तभी आप चुप होते. अगली बहस मे राखी सावंत को भेजूँगा.

सिद्धू: ना तीर से डरूँ ना तलवार से, ना राखी से ना राखी के किसी क्लोन से. सिद्धू डरता है तो सिर्फ़ अपनी बीवी के फोन से.

दिग्विजय: बाहर जाने का रास्ता किधर है, ये आदमी तो पागल है!

सिद्धू: पागल कोई बन नहीं जाता सिर्फ़ आपके कहने से, जैसे गटर का पानी निर्मल जल नहीं बनता  गंगा मैया मे बहने से!

FN पत्रकार: सिद्धू जी किसी गुजरात की नदी का नाम फिट कर लेते, किसी तरह तो ये बहस गुजरात से जुड़ती.

सिद्धू: ना मैं कुछ जोड़ने आया था, ना तोड़ने या काटने. मुझे तो सिर्फ़ भेजा गया था दिग्विजय जी का दिमाग़ चाटने.. ठोको ताली!

जब हमने दिग्विजय जी की प्रतिक्रिया लेने के लिए गरदन फिराई तो देखा की वो वहाँ से गायब हो चुके हैं. फिर हमने भी अपने काग़ज़ उठाए और दरवाज़े की टोह ली.

जब हम बाहर अपनी कार मे बैठ कर उसे स्टार्ट कर रहे थे तो बिल्डिंग के अंदर से आवाज़ आ रही थी

*इस बहस मे हम ना जीते तो क्या हुआ, हारे भी तो हम नहीं. जीत-हार के चक्कर मे फस जाए, वो शख्सियत तो हम नहीं*

और हमें ऐसा एहसास हुआ की इस बहस मे कोई जीते या हारे, भारतीय जनता ज़रूर हार रही है

Sandeep Kadian