Sunday, 19th November, 2017

ऋषि मुनियों के देश में अऋषि रहे ना कोय

04, May 2017 By JAG MOHAN THAKEN

बाबा रामदेव जी महाराज को आप चाहे योग गुरु कहें या संयोग गुरु; उनके “गुरु” होने में कोई संदेह नहीं रह गया है. बल्कि महागुरू का ताज भी उनके मस्तक पर छोटा प्रतीत होता है. हाँ, इतना भी निश्चित मानिये कि वो समय की नजाकत और नब्ज को टटोलते हुए ही बिलकुल सटीक कर्म–वचन–प्रवचन करते हैं. वे चाहे लंगोट धारण करें, चाहे नारी वस्त्र. वे मूल भारतीय संस्कृति के संवाहक हैं और पुनर्जागरण के पुरोधा भी. उन द्वारा किये जा रहे योग प्रयोगों तथा आयुर्वेदिक जड़ी – बूटियों को वर्तमान भौतिक युग में भी आंग्ल चिकित्सा पद्धति के साथ प्रतियोगिता में आगे बढाने के प्रयास करना और प्राचीन भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित करना उनका न केवल लक्ष्य है, अपितु कर्म–धर्म भी बन गया है.

हरिद्वार में पतंजलि आयुर्वेदिक रिसर्च इंस्टिट्यूट का देश के प्रधान मंत्री माननीय मोदी जी द्वारा उदघाटन के समय उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे वास्तव में “गुरू” हैं और उन्होंने गुरू के पद के अनुसार ही आचरण करते हुए मोदी जी को “राष्ट्र ऋषि” की समय की मांग के अनुसार ‘सही समय पर सही उपाधि’ देकर भारतीय प्राचीन परम्परा का सही निर्वहन किया है. आने वाला इतिहास उन्हें हमेशा याद करेगा.

केवल एक योग्य गुरु ही तो यह प्रमाणित कर सकता है कि कौन सा शिष्य किस उपाधि के लिए पात्र है. उन्होंने देशवासियों को यह कह कर कृतार्थ कर दिया कि–मोदी देश को एक वरदान के रूप में मिले हैं, उनका राष्ट्र ऋषि के रूप में सम्मान होना चाहिए. बाबा रामदेव ने यह भी कहा कि आज पूरी दुनिया भारत का लोहा मान रही है. (भले ही पड़ौसी प्लास्टिक भी ना मानते हों.) प्रकाण्ड विद्वान् व गुरुजन किस भाषा में बात करते हैं, यह तो अभी शोध का विषय ही रहेगा. हम तो हमेशा से ही यही सुनते आये हैं– खग की भाषा खग ही जाने.

बाबा जी ने मोदी जी को राष्ट्र ऋषि घोषित कर “उपाधियों” का एक नया मार्ग प्रशस्त किया है. अब उन्होंने पदम भूषण, पदम विभूषण,पदम श्री की तर्ज पर राष्ट्र ऋषि, प्रधान ऋषि, मुख्य ऋषि, राज ऋषि, प्रान्त ऋषि, जिला ऋषि, तहसील ऋषि, गाँव ऋषि, कृषि ऋषि, उद्योग ऋषि, राष्ट्र गुरू, महा गुरू, विश्व गुरू आदि अनेकों उपाधियों का श्री गणेश किया है अब सरकार या जो भी स्वयंभू गुरु जब चाहे किसी को उपरोक्त “ऋषि या गुरू” उपाधियों से सुशोभित कर सकेगा. इसे कहते हैं नवाचार. अगर किसी राष्ट्र जन को आपत्ति ना हो तो मैं भी स्वयं को राष्ट्रीय व्यंग्य गुरु या व्यंग्य ऋषि घोषित करने का दु:साहस कर लूँ.

बाबा रामदेव की प्रधान मंत्री को उपाधि प्रदान करने की उदारता को देखते हुए अब सरकार को भी चाहिए कि योग (योग्य) गुरू को तुरंत प्रमुख परामर्श ऋषि या राष्ट्र गुरु के पद पर नियुक्त कर उपरोक्त सभी उपाधियों के लागु करण की प्रक्रिया को शीघ्रातिशीघ्र प्रारम्भ करे.

प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि गृहस्थ आश्रम की परम्परा को निभाते हुए भी महर्षि के पद सोपान तक पहुँच गए थे. कईयों ने इस परम्परा से थोड़ा हटकर परिवार–पत्नी व राजपाट को छोड़कर भी महात्मा बुद्ध की तरह ऋषित्व का निर्वहन किया है. हालाँकि वर्तमान समय में (“आईडिया थोड़ा चेंज) परिवार–पत्नी को छोड़ पाना तो आसान है, परन्तु राजपाट को छोड़ना थोड़ा कष्ट साध्य कार्य दिख रहा है. बल्कि पूर्व में जो व्यक्ति साधू ,साध्वी या महंत–योगी रह चुके हैं वो भी आज राज ऋषि बन रहे हैं, राज-काज चला रहे हैं. यह एक नई प्रवृति पनप रही है. नई पहल है या यों कहें नवाचार (मोदी जी का प्रमुख लक्ष्य) है. वास्तव में वे बेचारे समाज व देश हित में कितना बड़ा त्याग कर रहे हैं, आप तो शायद सोच भी नहीं सकते. जी करता है बलिहारी जाऊं मैं तो उनके इस बलिदान पर.

भारतीय मान्यताओं की जहाँ तक मुझे समझ है, जब कोई व्यक्ति बिना किसी बाह्य लाग लपेट के, दुःख–सुख को समान स्थिति मानते हुए, अपने शरीर-मन-विचार पर नियंत्रण कर लेता है, तो वो ऋषि बन जाता है. भारतीय ऋषियों की कठोर तपस्या सदैव उदाहरणीय रही है. यहाँ तो ऐसे ऋषियों के उदाहरण भी उद्धरित किये जाते हैं कि वे तपस्या–समाधि में इतने लीन हो जाते थे कि उनके शरीर के चहुँ ओर दीमक ने मिट्टी का आवरण चढ़ा दिया था. भारत के ऋषि तपस्या को अत्यधिक महत्त्व देते रहे हैं. और वे अपने शरीर, परिवेश, स्वजन, स्वहित- परहित सब कुछ भूल कर केवल और केवल उस शक्ति को पाने हेतु प्रयासरत रहते रहे हैं.

और जब व्यक्ति उस परम शक्ति को पा लेता है तो ब्रह्मलीन होकर ब्रह्म ऋषि हो जाता है या यों भी कह सकते हैं कि वह पूरे ब्रह्माण्ड की सत्ता पर काबिज हो जाता है. जब तक वह राष्ट्र की सत्ता पर काबिज रहता है तब तक वह राष्ट्र ऋषि ही कहलाता है. हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी में मुझे ब्रह्म ऋषि बनने की पूरी सम्भावनाये नजर आती हैं. शायद इसीलिए अब वे अपनी भगवा पताका को यू पी जैसे जातिगत प्रदेश में फहराकर “योगी” त्रिशूल गाड़कर अश्वमेघ के रास्ते पर चले हैं .देखते हैं “राम” के इस अश्वमेघ के घोड़े को रोकने वाला कोई लव–कुश मिलता भी है या नहीं ? मोदी जी अभी तक तो राष्ट्र पताका फहराने का लक्ष्य लेकर निकले थे, परन्तु लगातार मिलती जा रही इस अखंड जीत से प्रफुल्लित हो शायद वे विश्व पताका को ही हाथ में न उठा लें. खैर यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है, परन्तु इतना तो आभास हो ही रहा है कि सब कुछ भगवा करण करने के चक्कर में कहीं ऐसा ना हो कि ऋषि मुनियों के इस देश में अऋषि रहे ना कोय.