Friday, 23rd June, 2017

पाकिस्तान में फैल रहा हैं आयुर्वेद

23, Oct 2016 By khakshar

इस्लामाबाद. आज कल कुछ नए मुहावरे मार्केट में चल रहे हैं। लोग बोलने लगे हैं “दाम बनावे काम, ले बाबाजी का नाम।” सबसे लोकप्रिय नया मुहावरा है “अचार की चटकार, तलवार की धार से तेज होती हैं।” एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक को बोलते सुना, “बाबा का सामाजिक ज्ञान।” समझ न पाया तो गुरूजी से पूछा क्लास में बैठे  बच्चे बोले “नीम हकीम खतरे जान” अब ऑउटडेटेड हो गया हैं। वैसे हिंदी की पढ़ाई शुद्ध हिंदी में सिर्फ सरकारी स्कूलों में होती हैं।

दावुद से बचने के लिए बने योगी . बाबा के प्रथम पाकी शिष्य : योगाचारी सहिदादेव 
दावुद से बचने के लिए बने योगी. बाबा के प्रथम पाकी शिष्य : योगाचारी सहिदादेव

सूत्रों से जानकारी मिली हैं कि हमारे दो पुज्य बाबाजी, पाकिस्तान में दूकान का लाईसेंस बाँट रहा है। आरोप लगने लगे हैं बाबा जी साम्राज्यवादी है। कुछ लोगों ने तो दुशमन को घी खिला कर पालने का आरोप भी लगा दिया। अखबारों में तो ये तक लिख दिया हैं कि चवण-प्राश खिला बाबाजी उन्हें स्वस्थ बना रहे हैं।

हमने दो देशप्रेमी बाबाजी से संपर्क साधा। एक ने हमसे बात करने के लिए मना कर दिया। सनीमा “सर्जिकल-स्ट्राइक बाई MSG” की प्लानिंग में व्यस्तता जताई।हम समझ गए की ये बाबाजी कोई दवा बना रहे हैं। शेर-दिल बाबा को दवा-परीक्षण के लिए पाकिस्तानी चूहे चाहिए। पहले बाबा “सर्जिकल स्ट्राइक” कर दुश्मनों को कूटेंगे, फिर मरहम-पट्टी और दवा-दारू करेंगे। बाबा-धर्म, देश-भक्ति, व्यापर, दवा-टेस्ट इकठ्ठे निपटा लेंगे। इतना समझ “एक तीर से मल्टीप्ल निशान” का नया मुहावरा बन गया।

दुसरे बाबा जी ने दया-दिखा अपने बिज़नेस-एम्पायर का एक सेनापति हमसे बात करने के लिए भेजा। सेनापति ने हमारे बगुला,दस्यु-कन्या तथा गपोड़ी संपादको को “पवन-मुक्त (gas-free) कर दिया, एडवेर्टीस्मेंट बंद करने की बूटी सुँघाकर। उसके बाद कितने राज खोले, जैसे की भारतीय समान का प्रचार। सेनापति ने बताया, “जहाँ न पहुँचे सेना, वहाँ पहुँचे बाबा-चबेना (नमकीन)” सेनापति ने बताया की गोरा करने वाली मुलतानी मिट्टी को हम कब्ज़े में कर लेंगे। पहले दुश्मनों को गोट खिलाएंगे, फिर कोट के नीचे लंगोट पहनाएंगे। इतना बदसूरत कर देंगे उनको की कोई मुम्बइया सनीमा वाला उन्हें सुपर्णनखा या महिषासुर का रोल भी न देगा दुश्मनो को करेला-जूस पिला कर, उनका हाज़मा बिगाड़ देंगे हम।

जब बाबाजी के सेनापति चले गए तो रामचरितर चाय वाला गुनगुना रहा था

“काहे की काशी, काहे का काबा; धंधे में भी बड़ा शेर हैं बाबा;

न्यू-जरसी में खुला पाकी-ढाबा; करे बेस्टइंडियन फ़ूड का दावा”