Saturday, 21st April, 2018

जिए तो जिए कैसे

25, Dec 2017 By Kumar Dharmendra

दुनिया भर में बैटरी से चलने वाले कारों की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है. रतन टाटा ने पिछले सप्ताह टाटा टिगोर का इलेक्ट्रिक वर्शन बनाकर भारत में इस पूरी पहल को एक नया आयाम दिया है. हर जगह इस बात की चर्चा हो रही है की कब ये गाड़ियां आम लोगो तक पंहुच पाएंगी।

दिनेश, मेरे मित्र, को पता नहीं क्या सूझी उन्होंने अपनी गुल्लक तोड़ी, कुछ फिक्स्ड डिपोसिट का बलिदान करके मन बनाया की अब बाइक की सवारी से ऊपर उठने का वक़्त आ गया है, अब कार ले लेनी चाहिए। दो दिन में अपनी प्राथमिकताएं सेट करके गाड़ियों की एक लिस्ट तैयार कर ली. अगले एक सप्ताह में वे तमाम कार डीलर्स के शोरूम हो आये लेकिन सबकुछ मिलते मिलते कुछ छूट जाता। सेल्स मैन किसी भी गाडी को दुनिया की सबसे अच्छी कार बनाकर पेश करता और जब उनका मन लेने-लेने को होता तभी वह दूसरी गाडी की तरफ इशारा करके कह देता, “और उससे बेहतर कार यह है.” बस फिर वे वहां से खीज कर लौट आते.

दिनेश पहले ही कन्फ्यूज्ड थे, बाजार में विकल्पों की भरमार से, किसी ने उनका कान यह कहके भर दिया की गाडी जब ले ही रहे हो तो इलेक्ट्रिक गाडी ले लो- शौक भी पूरा होगा, पैसे भी बचेंगे, पर्यावरण सुरक्षा का भाव अलग से रहेगा. पैसे बचने वाली बात उन्हें सबसे ज़्यादा पसंद आयी और उन्होंने इलेक्ट्रिक गाडी ही लेने की ठान ली.

मध्यम वर्गीय मानसिकता हमेशा आपको दोराहे पर रखता है – न इस पार चैन न उस पार.

उनके दृढ निश्चय से कम से कम उनके परिवार वालों ने चैन की सांस ली की अब उनकी ‘अच्छी’ कार की अनंत खोज को विराम मिल जायेगा। दो महीने के बाद ही सही वे फिर से सामान्य जीवन जीने लग जायेंगे, उनका आत्मविश्वास लौट आएगा। लेकिन सब अगर इतना सरल होता तो कहानियाँ कैसे बनती भला.

भारत में जिस तरह दिन-रात इलेक्ट्रिक गाड़ियों की कहानियां मीडिया में चलायी जा रही हैं ऐसा लगता है रातों-रात अच्छे दिन आ जायेंगे। धरती पर सबकुछ ठीक कर लेने का इससे बेहतर विकल्प लोगों को मिल नहीं रहा. सबने अपनी-अपनी कहानी बना रक्खी हैं, रोमांस है की थमने से नहीं थम रहा. यथार्थ से हालांकि ये बातें कोसों दूर है, बिलकुल बॉलीवुड की पटकथा जैसी – भारत में उँगलियों पर गिने जाने लायक इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनती और बेचीं जातीं हैं. बाजार अब भी पारम्परिक गाड़ियों से ही अटे  पड़े हैं.

दिनेश ने संकल्प कर लिया था, सो वे पंहुच गए इलेक्ट्रिक कार के शो रूम में और सेल्स मैन से अपनी मंसा जाहिर कर दी. पहले तो टिपिकल ‘गाडी नहीं खरीद सकने वाली’ शकल देखकर सेल्स मैन ने रिसेप्शन से ही उन्हें घर भेजने की चेष्टा की लेकिन वे अड़े रहे और गाडी दिखाए जाने का डिमांड रख्खा. सेल्समैन ने अनमने ढंग से ही उन्हें मैनेजर के पास अंदर जाने को कहा. सेल्समैन ने उन्हें गाडी की कीमत बताई और फिर गाडी खरीदने की शर्तें समझाईं। यही की कौन इसे खरीद और चला सकता है और कैसे कंपनी जब चाहे अपना माल वापस ले सकती है. कुल मिला कर मामला कॉन्ट्रैक्ट पर ली हुई गाडी का था। उनकी तन्द्रा अब टूटने लगी थी. ब्यूटी का मिलान बटुए से फिर से नहीं हो रहा था. उन्होंने टेबल पर पड़े शीशे की गिलास से पानी की एक घूँट पी, मैनेजर को प्रणाम किया और बड़बड़ाते हुए बाहर निकल गए, मानों किसी ने दौड़ा दिया हो. जाते जाते बाहर बैठे सेल्समैन को भी फटकार लगाई, “लोगों को बेवक़ूफ़ बनाते हो, शर्म आनी चाहिए”. सेल्स मैन को तो जैसे पता था की ये बंदा इलेक्ट्रिक कार ले ही नहीं सकता, उसने बुरा नहीं माना, मुस्कुरा भर दिया।

लौट के दिनेश घर को आये. वे आजीवन कार नहीं खरीदने की भीष्म-प्रतिज्ञा करने ही वाले थे की राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ मार्गदर्शक हरिवंश प्रसाद सिंह ने हाजीपुर में अपनी जनसभा में पशु चारा से चलने वाली कारों का जिक्र कर दिया। उन्होंने हुंकार लगाईं की जब गोबर से लालटेन जल सकता है तो कार क्यों नहीं चल सकती, हम चला कर दिखाएंगे, आने दीजिये हमारी सरकार। एक बार फिर एक मध्यम वर्गीय प्राणी दोराहे पर खड़ा कन्फ्यूज्ड हो रहा था। विडंबना ही कहेंगे की मेरे मित्र ने चारे वाली कार ही खरीदने का सोच लिया है चाहे इसके लिए उन्हें शहर छोड़कर गांव  ही क्यों न जाना पड़े.

इस घटना से मुझे फायदा यह हुआ है की मेरा पूरा परिवार सहमा हुआ है और मेरे सिर से गाडी खरीदने का प्रेशर कम हो गया है.