Friday, 21st July, 2017

जब गोलियों ने पत्थरों से बातचीत की पेशकश की

30, Apr 2017 By Manpreet Singh

कश्मीर में जब गोलियों ने पत्थरों से बातचीत की पेशकश की:

ख़बरों में सुना की आजकल हसीनो ने भी पथ्थर उठा लिए हैं वादी में,

तो मन में उठे सवाल पर शायद कोई जवाब हो या ना हो

तुम्हारी गुस्से और Tear Gas से नम लाल आँखों में खो कर, हम गोली चलाना भूल जायें तो क्या हो?

हमारे माथे पर बहते खून, चेहरे पर दर्द और सवाल पढ़के, तुम्हारे पत्थर भरे हाथ रुक जाएँ तो क्या हो?

क्या होगा फिर तुम्हारी और हमारी कसमों का जो हमने खायी हैं, अपने जूनून ऐ फ़र्ज़ पे मर मिटने की

क्या होगा फिर उन लोगों का, जो हमारे दर्द, जख्मों और लाशों की तस्वीरों से वोटों के नोट बटोरते हैं

छोड़ो, जाने दो, यूँही क्यों सोचना ऐसे हसीन खवाब देखना हम दोनों को मना है,

पत्थरों और गोलियों में हरगिज़ मुहब्बत नहीं हो सकती

तो क्या इंसानों में मुहब्बत? पता नहीं, पर जो अगर हो तो क्या हो