Saturday, 25th November, 2017

मैं इस देश का प्रधानमंत्री बनना चाहता हूँ

30, Jul 2013 By Mahapurush Mahatma

(DISCLAIMER: “इस कविता के सभी पात्र काल्पनिक है और इनका किसी भी जीवित  या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है”)

मै विचलित नहीं होता, हर कटाक्ष हंस के सह जाता हू|
मै विचलित नहीं होता, हर कटाक्ष हंस के सह जाता हू|

छक्कन मियां जब कॉलेज पहुचे, तो देखा की प्रोफेसर साहब सभी से उनके सपनो के बारे में पूछ रहे थे | कुछ विध्यार्थी डॉक्टर,कुछ इंजिनियर , कुछ क्या बनना है, यही सोच रहे थे |

जब छक्कन की बारी आई तो वो पूरे आत्मविश्वास से खड़ा हुआ और बोला –

“सर, न तो मै डॉक्टर,न इंजिनियर,न संत्री बनना चाहता हू, मै इस देश का प्रधानमंत्री बनना चाहता हूँ |“

सुनकर प्रोफेसर खुश हुए, सोचा कोई तो राजनीती मे जाना चाहता है, जोश मे आकार पूछ ही दिया, “बता बेटा,तू प्रधानमंत्री क्यों बनना चाहता है |”

छक्कन मियां बोले, “सर, पहले मै भी डॉक्टर बनना चाहता था, पर डोनेशन के लिए हमारे पास पैसे नहीं है, अपनी प्रतिभा के बल पे दाखिला मिल जाता, इतने प्रतिभावान हम वैसे भी नहीं है |” अपनी प्रतिभा का अवलोकन मैंने अपने मस्तिष्क से कराया है, और मेरे मस्तिष्क ने मुझमे सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री बनने का गुण पाया है |”

अब मै आपको भी बताता हूँ ,के मै खुद को प्रधानमंत्री पद के लिए सुयोग्य क्यों पाता हू |

आजतक मै कभी विध्यार्थी परिषद का अध्यक्ष नहीं बन पाया, बनता भी कैसे? हारने की प्रबल सम्भावना के कारण मै चुनाव हई नहीं लड़ पाया | पर जब भी अध्यक्षा महोदया किसी कारणवश अपना पदभार ग्रहण नहीं कर पाती है, वह मुझे, सिर्फ मुझे! हई केयरटेकर अध्यक्ष बनाती है|

मेरे कुर्सी पे होने से उनकी ताकत को खतरा नहीं होता है, मै तो मजे मे सोता हू, हर काम उनके कथानुसार होता है |

सर,आप तो जानते है,आजकल ज्यादातर नेता भ्रष्टाचार मे लिप्त पाए जा रहे है| कुर्सी पे बिठाने के लिए वे साफ़-सुथरी छवि वाले निक्कमे चाह रहे है|

उनकी इस मज़बूरी को मै भली भांति जानता हू, मै इस देश का प्रधानमंत्री बनना चाहता हू |

मै विचलित नहीं होता, हर कटाक्ष हंस के सह जाता हू, कोई मुझे अध्यक्षा का चमचा कहे, तो सुनकर मै चुप रह जाता हू| मै अपने काम से काम हू रखता, अन्य बातो पे ध्यान नहीं देता हूँ | मेरा काम है काम नहीं करना, इस काम पे मै खास ध्यान देता हू |

निकम्मा,निखट्टू, नपुंसक कह लो, मै पद से चिपट कर रहना जानता हू, मै इस देश का……

ऐसा नहीं के मै काम नहीं कर सकता, पर सारे काम मै मैडम पे छोड़ देता हू, वो आर्डर टाइप करवाके भेज देती है, मै उसके नीचे अपना नाम जोड़ देता हू| किसी विध्यार्थी को परेशानी हो तो वो मैडम के पास जाता है,

मुझे, सिर्फ सांत्वना देना आता है| मुझे राम बनने मे दिलचस्पी नहीं, मै भरत की तरह सरकार चलाना जानता हू, मै इस देश का……

पर मेरी मैडम बड़ी दयालु है, मेरा बड़ा ख्याल रखती है| मै ही असली अध्यक्ष हू, विध्यार्थीयो को यही कहती है| उन्होंने मुझ जैसे तुच्छ प्राणी को जो सम्मान दिया, उसका ऋण मै कैसे चुकाऊं ?

आप ही बताइए सर, उस त्याग की देवी के विरूद्ध मै जाऊ तो कैसे जाऊ? वो मुझे महात्मा कहे या महापुरुष, अपनी औकात मै खूब जानता हू, मै इस देश का……

ये सुनकर प्रोफेसर को छक्कन पे गर्व और देश पे शर्म आई, एक पल के लिए उनकी आँखे डबडबाई| पलकों के भींगने से पहले, आँखों को उन्होंने पोछ लिया, असली अध्यक्षा महोदया जी ने जोर से कहा -“तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ!”

प्रोफेसर साहब बोले, “छक्कन, तुने सही निर्णय किया है,

प्रधानमंत्री पद के लिए तू सर्वश्रेष्ठ उम्मेदवार है, ये मैंने भी मान लिया है| भले ही तू राजनीती के दावपेंचों से अनजान है, पर राजनीती का सबसे बड़ा गुण चमचागिरी है,जो तुझमे विद्यमान है|”

असली अध्यक्षा मैडम जी अब खुद को रोक न सकी और बोली- “छक्कन, ऐसे ही मनोयोग से काम कर, तू बहुत आगे जाएगा, तुने मेरा मन मोह लिया है, एक दिन जरुर प्रधानमंत्री बन जाएगा|”