Sunday, 21st January, 2018

हरिशंकर परसाई की आत्मा ने किया सुसाइड, पढ़ें पूरी कहानी

04, Dec 2017 By A. Jayjeet

नई दिल्ली। हरिशंकर परसाई की आत्मा ने सुसाइड कर लिया है। इस बात का खुलासा तब हुआ, जब उनका एक सुसाइड नोट सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वे ऊपर से नीचे कब आए और कब सुसाइड करके वापस चले गए, इसकी किसी को कानो-कान भनक नहीं लग सकी। इस बीच, पुलिस ने यह कहकर मामले की जांच करने से इनकार कर दिया है कि इस ‘अज्ञात’ आत्मा के केस में उसे कुछ भी मिलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए वह ऐसे आलतू-फालतू के मामलों में टाइम खोटी नहीं करेगी।

परसाईजी की आत्मा ने सुसाइड क्यों किया, इसका पूरा खुलासा उनके इस भारी-भरकम सुसाइड नोट से होता है। हम यहां उनके इस सुसाइड नोट को हूबहू पेश कर रहे हैं:

पिछले 22 साल से मैं ऊपर आराम की जिंदगी जी रहा था। शरदजी साथ में थे ही। छह साल पहले श्रीलाल शुक्ल, वही राग दरबारी वाले, भी आ गए थे। हमने देवी-देवताओं की नाक में दम कर रखा था। मैं बता दूं कि धरती पर देवदूतों के बार-बार आने-जाने का असर ऊपर भी पड़ा है। नीचे की गंद ऊपर भी आ गई है। पार्टी-पॉलिटिक्स यहां भी हो गई है… इंद्र का अलग गुट है, फलाने का अलग… क्या-क्या होता है, बता नहीं सकता। पर हमें तो मजे आ गए। अगर सिस्टम में गंद नहीं हो तो हम व्यंग्यकारों का क्या काम?

खैर, एक दिन शरद ने छेड़ दिया। बोला- नीचे की दुनिया और भी बढ़िया हो गई है। लिखने के लिए खूब माल-मसाला मिल सकता है। अब तो सोशल मीडिया भी है। फर्राटे से भागेंगे तुम्हारे व्यंग्य। एक बार नीचे हो आओ। वैसे भी अब नीचे ऐसा ‘नीच’ कोई बचा नहीं जो दम से लिख सके।

पता नहीं कौन-सी वह मनहूस घड़ी थी कि मैं शरद की बातों में आ गया। एक देवदूत से सेटिंग करके नीचे उतर गया। मैं बड़े मुगालते में था। लेकिन सुसाइड करने से पहले अब मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है कि जब मैं नीचे आने के लिए तैयार हो रहा था तो शरद और श्रीलाल कनखियों से एक-दूसरे को देखकर कुटिल तरीके से मुस्कुरा रहे थे। दोनों ने हाथों पर तालियां भी ठोंकी थी, ऐसा मुझसे सोमरस की बोतल लेते हुए देवदूत ने बताया था। सब स्सालों की प्लानिंग थी.. पर नीचे एक और किताब छपवाने के चक्कर में मैं उनकी यह शैतानी समझ ही नहीं पाया।

खैर, व्यंग्य लिखने से पहले मैं एक अखबार के दफ्तर में पहुंचा। सोचा यहीं से शुरुआत की जाए। अखबार के दफ्तर भी अब कारपारेट कंपनियों जैसे हो गए। संपादक का पता पूछते हुए मैं उसकी कैबिन की तरफ बढ़ा। लैपटॉप खोले हुए क्लर्क टाइप के जर्नलिस्ट मुझे देखे जा रहे थे। अब अपन तो वहीं पुराने जबलपुरी स्टाइल में थे। खैर, किसी तरह ढूंढते-ढांढते संपादक के कैबिन में पहुंचा।

मैंने कहा – मैं हरिशंकर परसाई। हूं, कौन? मैं, वही हरिशंकर…परसाई… अच्छा-अच्छा, बैठिए। मुझे लगा, पहचान लिया। अच्छा, तो आपको मंत्रीजी ने भेजा। क्या करें आजकल, रेवेन्यू और लाइजनिंग भी देखनी पड़ती है। मैं हमारे जीएम से मिलवा देता हूं। आप अपनी डील कर लीजिएगा। हां, मैं उसमें कहीं नहीं रहूंगा। अपन तो बस खबर तब सीमित रहते हैं।

मैंने कहा- समझा नहीं, मैं तो परसाई हूं… हां, समझ गया, राज इंडस्ट्रीज के पार्टनर के साले के बहनोई साहब। आप जीएम साहेब से बात कर लीजिए। खबर मैं देख लूंगा। चिंता मत कीजिए।

मैंने फिर कहा – मैं हरिशंकर परसाई, व्यंग्यकार। तो आप मंत्रीजी के पार्टनर के साले के बहनोई साहब राजशंकर परसाई नहीं हो। पहले बताना था… क्या नाम बताया आपने? हरिशंकर परसाई, व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई… अच्छा, परसाईजी, पर वे तो शायद अब नहीं हैं.. पर आप खुद को हरिशंकर परसाई कहकर किसे बना रहे हो? मैं व्यंग्य लिखना चाहता हूं… भैया, वैसे तो उन परसाईजी ने भी लिखकर क्या उखाड़ लिया था? और अब आप क्या उखाड़ लोगे?

अब तो व्यंग्य लिखने की गुंजाइश ही गुंजाइश है। माहौल ही ऐसा है। – मैंने खुद को जस्टीफाई करने की गरज से कहा। अरे सर, मीडिया में व्यंग्य के लिए जगह कहां है? और वैसे भी अब व्यंग्य-सयंग्य पढ़ता कौन है? … खैर, अब आए हैं तो चाय पीकर जाइएगा….मैं जरा मीटिंग में जा रहा हूं…

मैं चाय पिए बगैर ही वहां से निकल गया। लगा कि पहले खुद एक व्यंग्य लिखकर बात करनी चाहिए। व्यंग्य देखकर तो कोई भी छापने के लिए तैयार हो जाएगा। मेरा मुगालता कम नहीं हुआ था। इसी मुगालते में मैं एक व्यंग्य लिखकर एक दूसरे अखबार के दफ्तर में पहुंचा। मैं हरिशंकर परसाई…

अच्छा परसाईजी, आइए-आइए…। हमें जानकर संतोष हुआ कि संपादक ने पहचान लिया। हमने तो आपके काफी व्यंग्य पढ़े हैं : जीप पर सवार इल्लियां, क्या धांसू लिखा था… हमने कहा- यह तो शरदजी का है।

अच्छा, एक भूतपूर्व मंत्री से मुलाकात… नहीं, वह भी शरद का ही है, मैंने फिर कहा.. अब ऐसा है, हमने भी इतने व्यंग्य पढ़ लिए कि याद नहीं रहता कि किसने क्या लिखा, आप लोग लिखते भी एक जैसा हो…संपादक टाइप के उस व्यक्ति ने थोड़ा खिसियाते हुए कहा।

मैंने कहा, कोई बात नहीं। एक नया व्यंग्य पढ़ लीजिए…आज के हालात पर है.. हां, यह ठीक है, संपादक ने कहा। लेकिन पांच मिनट बाद ही बोला- ये क्या है? इसमें तो आप सीधे-सीधे मोदी को ही लपेट रहे हो। हमने तो इंदिरा से लेकर मोरारजी तक सबको लपेटा है तो फिर मोदी में क्या दिक्कत है….

सर, पहले का जमाना कुछ और था। आज ऐसा नहीं कर सकते। ये तो बिल्कुल नहीं छाप सकते। इनके खिलाफ तो कोई नहीं छापेगा। किसी को नौकरी गंवानी है क्या?

हम समझ गए। हमने भी समझौता कर लिया। अगले दिन राहुल के खिलाफ लिखकर ले गए। पहले भी हमने कांग्रेस पर काफी लिखा था। तो इस बार तो बिल्कुल भी दिक्कत नहीं हुई। फिर उसी संपादक के कैबिन में पहुंचे। उन्होंने दो-चार-छह लाइनें पढ़ीं। बोले- सर, यह कुछ ज्यादा ही हो गया है। मैंने कहा – अभी ये लोग सत्ता में नहीं हैं। आपकी नौकरी नहीं जाएगी।

क्या भरोसा, कल आ जाएं… बहुत तीखा है। कांग्रेसी स्साले बिलबिला जाएंगे। खुदा ना खास्ता सत्ता में आ गएं तो सबसे पहले हमारी ही गरदन मरोड़ेंगे। तो हम नहीं लिखे…? थोड़ा निराश होकर हमने पूछा?

नहीं-नहीं सर, आप लिखिए। परसाईजी की आत्मा का लिखा व्यंग्य तो टॉकिंग पॉइंट बन जाएगा। पर थोड़ा बचकर लिखना होगा। आप राजनीति छोड़ दीजिए… मैंने कहा- ठीक है। आज के समाज में तो बहुत सारी प्रॉब्लम्स हैं… कल कुछ और लाता हूं…

फिर मैंने बिल्डर्स पर लिखा… नहीं… पहले ही मार्केट की बारह बजी हुई है। ये छाप दिया तो हमारा धंधा भी ठप हो जाएगा। – संपादक बोला। शिक्षा माफिया पर… सर ये हम छाप ही नहीं सकते। किसी भी कीमत पर नहीं।

डॉक्टर्स पर… सर, कई बड़े हॉस्पिटल्स हमारे क्लाइंट्स हैं… किसानों की प्रॉब्लम्स पर… सर, हमारी ये तो टीजी ही नहीं है…फालतू में आपने टाइम खराब कर दिया।

पंद्रह दिन तक मगजमारी करता रहा… फिर थक-हारकर मैंने ही पूछ लिया- अब आप ही बता दीजिए, किस पर लिखूं…? सर, आप कुछ जोक्स क्यों नहीं लिखते? हल्के-फूल्के। खूब चलेंगे। वाट्सएप पर भी खूब शेयर होते हैं। किसी को कोई दिक्कत भी नहीं होगी। लोग पढ़कर और हंसकर भूल जाएंगे.. यह अच्छा रहेगा…

तो मैं समझ गया कि इस समाज में मेरी कोई जरूरत नहीं है। इसे तो बस जोक्स चाहिए, क्योंकि जोक्स किसी पर सवाल नहीं उठाते। इसलिए मैं वापस जा रहा हूं। मेरी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार न माना जाए। वैसे भी मेरी मौत से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।… और ऊपर जाकर शरद और श्रीलाल से भी तो निपटना है….

हरिशंकर परसाई की आत्मा