Tuesday, 17th October, 2017

अब JNU में अलगाववाद, गंगा ढाबा ने की कैंपस से आज़ादी की मांग

12, Feb 2016 By Pagal Patrakar

नई दिल्ली. कश्मीर को भारत से आज़ाद करवाने में JNU की चल रही कोशिशों को उस वक़्त तगड़ा झटका लगा जब विश्वविद्यालय के ही एक हिस्से ने अपने को आज़ाद करने की मांग उठा दी। ख़बर है कि JNU के मेन गेट के नज़दीक स्थित गंगा ढाबा ने ये मांग की है।

इस बात का ख़ुलासा तब हुआ जब फ़िलिस्तीन की आज़ादी के जंगी और PhD में आठवीं साल बिता रहे रासबिहारी अलबेला तड़के तीन बजे गंगा ढाबा पर पच्चीसवीं बार सुट्टा मारने पहुंचे।

दिल्ली की सर्दी का विरोध करते हुए अलबेला ने सिर्फ़ कच्छा और गंजी पहन रखा था, उसके बाद भी उसके तन बदन में ज़बरदस्त गर्मी फैल गई जब उसने गंगा ढाबा से उठते विरोध के स्वर को सुना।

Ganga Dhaba
आज़ादी की नई लड़ाई का ‘ग्राउंड ज़ीरो’

“अपनी बकचोदी जारी रहेगी, चाय की आखिरी प्याली तक। आज़ादी की जंग जारी रहेगी, JNU की बर्बादी तक!”

गंगा ढाबा के सामने रखे एक पत्थर से लगातार ये आवाज़ें आ रही थी। रासबिहारी ने तुरन्त पत्थर पे एक पत्थर फेंका और फ़िलिस्तीन-कश्मीर स्टाइल में अपना विरोध दर्ज़ करवा दिया। इसके बाद वो स्टूडेन्ट यूनियन के लड़कों के पास पहुंचा और इस बग़ावत की बात बताई।

“ढाबा बिक गया है!” अलबेला ने उपस्थित क्रांतिकारियों को आगाह किया, “मैगी के वापस आने और रामदेव के नूडल्स के बाद हिंदू पूंजीवाद और फ़ासीवाद लगातार बढ़ रहा था। हमने ध्यान नहीं दिया और अब ये ढाबा ग़लत रास्ते पर निकल चुका है। JNU की आत्मा पर ये एक कुठाराघात है। हमें इसके ख़िलाफ़ आंदोलन करना चाहिए।”

क्रांतिकारियों का उपस्थित समूह, जिसने अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप को हराने के लिए ‘नो-शेव 2016’ का कैम्पेन चलाया हुआ था, ने तुरन्त रासबिहारी की बातों का संज्ञान लिया और अपनी अपनी चप्पल पहन कर दाढ़ी खुजाते हुए ढाबे की तरफ़ चल दिए।

वहां पहुंचते ही उन्होंने ढाबे को ललकारा। ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ और ‘बाज़ारू ढाबा मुर्दाबाद’ जैसे नारों से गंगा ढाबा दहल उठा। लेकिन ढाबे ने हार नहीं मानी।

“साले मुफ़्तखोरो, ढाबे के नाम पर रायता फैला रखा है तुमने!” ढाबे ने नारों का जवाब दिया, “सबसे ज़्यादा पैसै में कमाता हूं चाय, मैगी और अंडा बेचकर। और तुम लोग दूसरों के पैसों से मौज करते हो। कौन रहेगा ऐसों के साथ?”

“हर साल तुम्हारी वही घिसी-पिटी बातें सुन सुनकर पक गया हूं मैं! कल ही मुनिरका में रह रहे DU के कुछ स्टूडेन्ट्स पराठे खाने आए थे। क्या मस्त बाते कर रहे थे। बकचोदी की बकचोदी, और काम का काम। तुम तो न बकचोदी कर पाते हो, न काम। नहीं रहना तुम्हारे साथ! मुझे आज़ादी चाहिए!” ढाबे ने अपनी आवाज़ बुलंद की।

विरोध के इस स्वर को सुनकर तिलमिलाए छात्रों ने तुरन्त ढाबे पे तोड़फोड़ शुरू कर दी और विरोध में बोलते पत्थरों पे लाल पेन्ट से कुछ अंट शंट लिख दिया। हंगामा सुनकर ढाबे के समर्थन में भी कुछ लोग आ गए, और फिर मीडिया भी आ पहुंचा।

इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक हंगामा जारी था, और ढाबे पे बकचोदी भी।