Saturday, 21st October, 2017

बिहार चुनाव में देश का सामूहिक मुंडन

27, Oct 2015 By satishpandit

इस समय बिहार की राजनीति देश का सामूहिक मुंडन कर रही है। जिसे देखो, वह अपने उस्तरे से बिहार को मूंडने में लगा हुआ है। जिसे मूंडने का अवसर नहीं मिल रहा है, वह किसी मूंडने वाले का दामन थामे चुनाव-सागर पार करने का जुगाड़ बिछा रहा है। इन रत्नों को पाने के लिए ज्ञानीजन चुल्लू भर सागर में भी गोते लगाने को तत्पर हैं। अनेक नेता नारायण मनमोहिनी रूप धारण किए सत्ता-अमृत हड़पने की शतरंज बिछाए ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे न्यायालीय असत्य में लिपटा बदसूरत सत्य।

पूरी बिहार की राजनीति की व्याख्या दो शब्दों में की जा सकती है – नाई और जजमान। नाई उसे कहते हैं जो मूंडने में जन्मजात सिद्धस्त होता है और जजमान उसे कहते हैं जो यह जाने हुए भी कि वह मूंडा जा रहा है, मुंडता है। वैसे नाई की हैसियत जजमान से कम आंकी जाती है, पर वह इतनी चतुराई से मूंडता है कि वह अपने जजमान की खूबसूरती को बढ़ाने वाला सेवक है। ऐसे सेवक को बाबू गुलाबराय ने नापिताचार्य भी कहा है। हमारे ऐसे सेवक हर पांच साल बाद, और आजकल सुना है, इनके मन में इतना सेवा भाव भर गया है कि कुछ महीने बाद ही सेवार्थ उपस्थित हो जाते हैं। आपको जरूरत हो न हो, ये आपकी सेवा में हाजिर होकर, करबद्ध होकर प्रार्थना गीत गाते हैं। और बेचारा मालिक इतना दयालु है कि अपने ही हत्यारों को ताज पहनाता है। अपना खून चूसने के लिए प्याला पेश करता है। तो हे देश और बिहार के संतों! इस महान देश के मालिकों! ळे जजमानों! तुम्हारे नाई अपने हथियारों से लैस आ गए हैं। अपनी मुंडी मुंडवाने के लिए तैयार रखो। इनकी आरती उतारो, इन बैलों को निमंत्रण दो कि वह तुम्हें मारें।

लोग सावन के अंधे होते हैं, मैं इन दिनों चुनाव का अंधा हूं। मुझे चारों ओर चुनाव ही चुनाव नजर आ रहा है।

मैं सब्जी वाले से पूछ बैठा – ‘और भाई क्या चल रहा है?‘

वह बोला – ‘बाबू जी इस समय तो महंगाई चल रही है। टमाटर आठ रूपये पाव है, प्याज बीस रूपए और भिंडी दस रूपए पाव है। लगता यह है कि महंगाई और बढ़ेगी।‘

पहले सब्जी वाला किलो का भाव बताता था आजकल पाव का बताता है। जानता है कि किलो की औकात बाबू की नहीं है। पर विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र की आम जनता से मैं सब्जी का नहीं बिहार की राजनिति का भाव पूछ रहा था, और उस अज्ञानी को सब्जी और राजनीति में फर्क पता नहीं था। शायद ऐसे ही अज्ञानियों के समूह को जनतंत्र कहते हैं।

मैंने कहा – ‘भाई, मैं सब्जी की नहीं बिहार की राजनीति की बात कर रहा हूं। और तुम हो कि सब्जी का भाव बता रहे हो।‘

एक ही बात है बाबू जी। आजकल किस नेता का भाव नहीं लगा हुआ है। कुछ के अभी लगे हुए हैं, कुछ के चुनाव के बाद लग जाएंगे। कुछ अभी किलो के भाव बिक रहे हैं, कुछ बाद में पाव के भाव बिकेंगे। अभी होलसेल की मंडी लगी हुई है, कुछ दिनों बाद खुदरा हो जाएगी। अब इतने दिन से फसल की तैयारी हो रही है और आप चाहते हैं कि फसल पकने पर उसे दान खाते में दे दें।

जिसे मैं अज्ञानी समझ रहा था, वह तो महाज्ञानी निकला। प्रजातंत्र की ऐसी सब्जीपूर्ण व्याख्या तो अच्छे से अच्छा आचार्य नहीं कर सकता है।

‘तो इस बार वोट किसे दे रहे हो?’

‘कोई अगर हमें कुछ देगा तो हम भी उसे दे देंगे।‘

‘और नहीं देगा तो?’

‘अपनी सब्जी बेचेंगे।‘

‘तो अपना बहुमूल्य वोट ऐसे ही बेकार कर दोगे?’

‘बहुमूल्य है इसीलिए तो बिना मूल्य के वोट नहीं देंगे। बाबूजी आप ही सोचो कि यह कहां का इंसाफ है कि वे तो हमारे वोट के बल पर जीतकर करोड़ों साफ करें और उसका हमें झूंगा भी देने को तैयार न हों। हम इस रूपए की चोरी करें तो पुलिस वाले डंडे खएं, जेल जाएं और वे करोड़ों का घोटाला करें तो जेपीसी के चोर रास्ते से निकल जाएं और जेल भी जाएं तो चुनाव जीतने और राज्य को खाने की जुगत भिड़ाएं।‘

‘पर भई, तुम्हरे वोट न देने से क्या होगा, संसद में तो वह अपने वोट के बल से भी पहुंच सकते हैं। यही तो हमारे जनतंत्र की खूबी है कि सिंगल हड्डी की पार्टी वाला भी दावा करता है कि उसे मंत्री बनने का जनादेश मिला है। ऐसे में तुम्हारे वोट की औकात ही क्या है?’

यह चुनाव का मसला भी कितना भटकाता है। मैं बात कर रहा था नाई की और बीच में आ गया सब्जी वाला। मैं जानना चाहता हूं कि इस बिहार चुनाव के नतीजे क्या होंगे और वे कह रहे हैं कि जजमान बाल सामने आ जाएंगे। और यदि जजमान गंजा हो चुका हो तो?