Monday, 26th June, 2017

बहुत बुरा किया, रिज़र्व बैंक ने लिमिट ₹4500 से ₹10000 बढ़ाकर

17, Jan 2017 By Abhinav Kumar Anshu

ATM के बाहर धक्कमपेल भीड़ लगती थी। मामा आड़ी तिरछी लाइन को हॉकते। ये हुल हुल्लल्ल। सर! हमको इ धकेल के बाहर निकाल दिया। इहवां लगे थे हम। लोग इंतजार करते।

यार अभी तक कुछ खाने पीने के लिए नहीं आया। कल उ ब्रिज वाला एटीमवा के पास मनोज तिवारी भैया मोतीचूर का लड्डू बाँट रहे थे। ओवरटाइम कर यहाँ टाईमपास करने वाले मित्रों से भी मुलाक़ात संभव हो पाया था। अर्थव्यवस्था पर ये लंबी लंबी बहस। व्हाट्सएप्प के माँसाहारी जोक्स सुना कर हँसी ठिठोली। विहंगम दृश्य गांव के मंदिर के चबूतरे पर बतकहि के जैसा। जहाँ सारे काम निपटा मस्त जमा होते है।

सोचता मैं क्यों लाइन में लगा हूँ। इंजीनियरिंग करके भी एकाउंट खाली है। शायद बैंक ने 50 के भी नोट डाले हो। पिछले महीने ही लिए दोस्त का कर्ज़ा नहीं चुकाया है। अभी भंडारे के लाइन में लगकर तृप्ति के साथ थोडा पूण्य भी हो जाता था। तभी बड़ा सा काला चश्मा, ठोर लाल और दुपट्टा लपटे इक सुश्री का आगमन होता। यु सो डिस्क्स्टिंग मैकेनिकल इंजीनियर सुन सुन हिन् भावना से ग्रसित हो गए थे। आज आगे खड़े करने का अनुरोध। दिल से आवाज आती थैंक यूँ मोदीजी। आप 50 क्या 100 दिन ले लो। नोटेबन्दी का विरोध करने वालों को नवाज शरीफ़ को गिफ्ट कर दो। दिल बहल जाता था ATM में लग जाने से। दिल बहल जाता था उनके आ जाने से।