Wednesday, 18th October, 2017

समोसा और लौकी पर जेएनयू विवाद का टाइमलाइन - शुरू से सब कुछ जानने के लिए ये पढ़ें

22, Feb 2016 By Pagal Patrakar

9 फ़रवरी के पहले के कुछ दिन

जेएनयू में सब नौर्मल था। दिन में क्लासेज़ चल रही थीं। रात में स्टूडेन्ट्स कॉल सेंटर में जॉब करने जा रहे थे। नए पोस्टर लग रहे थे। ओमर ख़ालिद भी पोस्टर लगा रहा था। एबीवीपी भी। घनघोर वाद विवाद चल रहा था। फ़िलिस्तीन की आज़ादी के आसार और मज़बूत हो रहे थे। डोनाल्ड ट्रंप गंगा ढाबा प्राइमरी हार चुका था। और सामने मुनिरका में रहने वाले कुछ लड़के जेएनयू के स्टूडेन्ट होने का ढोंग कर होस्टल का सस्ता खाना खाकर वापिस जा रहे थे।

JNU
ग्राउंड ज़ीरो- समोसा-लौकी जंग का मैदान

9 फ़रवरी की रात

ओमर ख़ालिद के डीएसयू नाम के संगठन ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। जेएनयू स्टूडेन्ट यूनियन का कन्हैया भी वहां मौजूद था। कन्हैया बिहार का निवासी है जहां अमूमन सांस्कृतिक कार्यक्रम में समाजवाद और सामाजिक न्याय की बात होती है और “लहंगा उठाई ले” जैसे क्रांतिकारी गाने भी बजते हैं।

पर जेएनयू का सांस्कृतिक कार्यक्रम कुछ अलग होता है। यहां नारे लगते हैं। हर तरह के नारे। नारों से ही नवनिर्माण हो सकता है। इसलिये नारा सर्वोपरि है। सो ख़ूब नारे लगे। इतने लगे कि फ़िलिस्तीन से पहले कश्मीर के आज़ाद होने के आसार जाग गए और गंगा ढाबा पे मोदी की ज़मानत ज़ब्त हो गई।

अमर शहीद अफ़ज़ल गुरू, जिसने देश की संसद पर रंगाई पुताई की मांग करते अपनी जान दे दी थी, के सम्मान में भी नारे लगे। ऐसे ही एक और शहीद मक़बूल भट्ट, जिसने कश्मीरी हिन्दुओं को दिल्ली तक की एक तरफ़ा तीर्थ यात्रा आसान करने के लिए पक्की सड़क की नींव रखी, को भी याद किया गया।

आज़ादी ब्रांड की हरी चटनी में डुबोकर भारत नामी समोसे के टुकड़े टुकड़े करने की बात हुई, क्योंकि आधी रात को सारे स्टूडेन्ट्स भूखे होते हैं। जेएनयू में मैगी की बात नहीं होती क्यूंकि ये विदेशी नूडल्स दरअसल साम्राज्यवाद की ज़ंजीर हैं।

10 फ़रवरी

सांस्क़तिक कार्यक्रम का विडियो सोशल मीडिया, जो कि संघ परिवार का एक हिस्सा माना जाता है, पे वायरल हो गया। तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा गया। अमर शहीद अफ़ज़ल गुरू और मक़बूल भट्ट को आतंकी बताया गया। हरी चटनी को लाल ख़ून, और समोसे को देश की संज्ञा देकर ओमर ख़ालिद और कन्हैया को बदनाम करने की कोशिश की गई।

11 फ़रवरी

अर्नब नाम के एक आतंकी ने इस वीडियो को अपने चैनल पे ख़ूब चलाया। इस तरह के सांस्कितक कार्यक्रम हमेशा से होते रहे थे जेएनयू में, लेकिन पहली बार किसी चैनल पे दिखा। देश में मासूम समोसावादीयों को देशद्रोही बताया गया आतंकी अर्नब द्वारा।

12 फ़रवरी

समोसा तोड़ने वाली बात के वायरल होने से कन्हैया थोड़े घबराए। उसने एक नया स्पीच दिया। इस बार अमर शहीद अफ़ज़ल गुरू या मक़बूल भट्ट को नहीं बल्कि बाबासाहेब अंबेडकर और भगत सिहं को याद किया गया। भारत नामक समोसे नहीं बल्कि बीजेपी नामक लौकी के टुकड़े टुकड़े करने की बात हुई। लौकी के ख़िलाफ़ दी गई ये स्पीच सबको जंची क्योंकि लौकी कई लोगों को पसंद नहीं।

13 फ़रवरी

कन्हैया को लौकीतंत्र में भरोसा न होने के आरोप में ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

14 फ़रवरी

मातृ-पितृ पूजन दिवस के दिन कन्हैया के माता पिता को नौन-अर्नब नौन-आतंकी मीडिया ने ढूंढ निकाला। कन्हैया के नये वाले स्पीच को भी ढूंढ निकाला गया। सारे नौन-अर्नब नौन-आतंकी मीडिया ने इन दोनो चीज़ों को ख़ूब प्रचारित प्रसारित किया। कन्हैया को बापूजी से भी ज़्यादा निर्दोष बताया गया हालांकि ट्विटर पर #निर्दोष_कन्हैया_को_न्यायमिले ट्रेन्ड नहीं हो पाया क्योंकि सोशल मीडिया संघ परिवार का एक हिस्सा है।

15 फ़रवरी

दिन भर आफ़िस में ख़ाली बैठे कुछ वक़ीलों ने, जो पहले से ही समोसा तोड़ने वाली बात पर फूँके हुए थे, पत्रकारों पर हमला कर दिया। सूत्रों के हवाले से कुछ पत्रकारों ने वक़ीलों को ये कह कर ग़ुस्सा कर दिया था कि तुम लोग तो समोसा बेचने लायक भी नहीं हो। किसी वक़ील ने पूछ लिया कि क्या फिर तुम पत्रकार लोग ही समोसा बेचने में लगे हो? माहौल गरमाया और लात जूते चल गए।

16 फ़रवरी

पत्रकारों ने वक़ीलों के विरोध में मोर्चा निकाला। पूरी बहस समोसे से हटकर वक़ीलों पे चली गई।

17-18 फ़रवरी

चुतियापा निरंतर जारी रहा। ओमर ख़ालिद का पता नहीं चला। पत्रकारों ने वक़ीलों का ग़ुस्सा दिल्ली पुलिस कमीश्नर बस्सी पे भी निकाला। बस्सी को लौकी विक्रेता बताया गया।

19 फ़रवरी

एनडीटीवी के रवीश कुमार ने वक़ीलों का काला कोट अपने टीवी के परदे पे डाल दिया। समोसे तोड़ने की बात अब किसी को याद नहीं रही।

20 फ़रवरी

अपनी थाली में पनीर की सब्ज़ी हटाकर लौकी की सब्ज़ी डाले जाने से नाराज़ कुछ जाटों ने इधर उधर आग लगा दी। ऐसा लगा जेएनयू विवाद गया तेल लेने। लेकिन नौन-अर्नब नौन-आतंकी मीडिया पे कुछ ख़ास असर नहीं पड़ा। जाटों को लौकी से जोड़ा गया और कन्हैया के लौकी वाले स्पीच पर ही बाते हुईं।

21 फ़रवरी

आधी रात को अचानक जेएनयू में ओमर ख़ालिद प्रकट हुआ। उसने भी कन्हैया की तरह नयी स्पीच दे डाली। समोसे तोड़ने की बात नहीं की इस बार। कन्हैया की तरह ही लौकी को ख़ूब लानत भेजी। नौन-अर्नब नौन-आतंकी मीडिया ने लौकी वाली बात तुरंत लपक ली।

22 फ़रवरी

लौकीतंत्र पे हमले के आरोप में ओमर को ग़िरफ़्तार करने की बात चल ही है। पर अभी हुई नहीं है। लेकिन लौकी के ख़िलाफ़ कई आवाज़ें उठ रही हैं। समोसा अब किसी को याद नहीं।